हम तो डूबेंगे ही सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे        

इन दिनों भाजपा के अंदर घोर संकट की स्थितियां बनी हुई हैं और जैसा कि हरदम होता आया है कि संकट में अपना साया भी साथ छोड़ देता है। ऐसा ही कुछ भाजपा और संघ के अंदर दिखाई दे रहा है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि शाह-मोदी में भी अंदरूनी तकरार चल रही है। संघ दोनों को हटाना चाहता है। पहले राष्ट्रपति के लिए मोदी के नाम पर संघ रज़ामंद था किंतु मोदी-शाह जोड़ी के दिन प्रतिदिन जो कारनामे सामने आ रहे हैं उससे लग रहा है कि संघ और ज़िल्लत सहने के लिए तैयार नहीं है।

इस स्थिति का अंदाजा शायद लोकसभा स्पीकर को भी हो गया है इसलिए वे स्पीकर, राज्य सभा के सभापति और विधानसभा के अध्यक्षों के लिए निष्पक्ष व्यवहार की बात कहने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं। जबकि बिड़ला जी ने जिस तरह का सौतेला व्यवहार प्रतिपक्ष के साथ अपने कार्यकाल में किया है वैसा आज तक किसी स्पीकर का ऐसा एक पक्षीय व्यवहार किसी का नहीं रहा। इस पद की गरिमा को बिड़ला ने आहत किया है।

इससे पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का जाना और कथित तौर पर सरकार गिराने का प्रयास ही उन्हें ले डूबा। भाजपा यानि मोदी-शाह से मोह भंग की स्थिति यहीं से उजागर हुई है।

अंदरूनी खींचतान में अब सहयोगी गठबंधन भी कब किस करवट बैठ जाएं कहा नहीं जा सकता। इतना तो ज़ाहिर हो चुका है कि उनकी खरीदी की बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। नायडू के तेवर दिखा रहे हैं कि शायद सौदा पक्का होता नज़र नहीं आ रहा है। उधर नीतीश की स्थिति गाजर-मूली की तरह है वे साथ ज़रूर दिख रहे हैं किंतु बौराए हुए हैं। उनकी हालत बहुत खराब है ना उगलते बन रहा है ना लीलते। उनकी अपनी ज़मीन राहुल की वोट अधिकार यात्रा ने बिगाड़ के रख दी है। विख्यात पलटूराम कब पलटी मार जाएं ये भी सब जानते ही हैं।

दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सन् 2013 में मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में अनिल अंबानी ने जो भारी-भरकम सहयोग दिया उसे मोदी-शाह भूल गए हैं उनके घर छापे पड़ रहे हैं उन पर बैंक के साथ धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज हुई है। विदित हो राफेल निर्माण का काम मोदी जी ने एक ऐसे उद्योगपति को सौंपा था जिसे इस क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं था। तब इस विषय को लेकर मोदी की बहुत आलोचना भी हुई थी। लेकिन उन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा था। मोहब्बत के बीच में ऐसा ख़लल बड़े सवाल के रुप में देखा जा रहा है।

उनके बड़े भाई मुकेश अंबानी से भी वह यारी अब नहीं रही। उनके छोटे अनुज अनंत अंबानी के वनतारा जहां मोदी खुद जाकर अनंत की पीठ थपथपाए थे आज संकट में है। इसके अलावा मुकेश अंबानी की अमेरिका से निकटता से गौतम अडानी पर ख़तरा बढ़ा है। वैसे भी रुस से व्यापार पर इंकार से भी डोनाल्ड ट्रम्प बौखलाया हुआ है।कल से 25 फीसदी टैरिफ भी बढ़ चुका है। अडानी की मुश्किलें बढ़ेंगी ही। कहने का आशय यह है कि ना अब हम दो रहे ना हमारे दो।

ऐसी स्थिति में जब संघ की मुनादी हो रही है कि 17 सितंबर को झोला उठाओ और ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ के बीच अब एक ही रास्ता बचता है कि हम तो डूबेंगे ही सनम तुम्हें भी लें डूबेंगे। इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी का घेराव मोदी-शाह मिलकर करने वाले हैं। जिसके संकेत सामने आने लगे हैं। क्योंकि वे संघ की निकटता और पसंद में इस समय शीर्ष पर हैं।

इस समय जो स्थिति बन रही है उसमें लगता है कि ना तो योगी बचेंगे, ना मोदी ,ना भाजपा और ना ही संघ। अंदरखाने जो चल रहा है उसमें समीकरण बनते नहीं बिगड़ते नज़र आ रहे हैं। जिसका फायदा सीधा इंडिया गठबंधन को मिलेगा। इसलिए हर तरफ कोहराम है। सुना तो यहां तक जा रहा है कि गृहमंत्री अमित शाह के खासमखास चुनाव आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार ने भी पल्टी मार दी है और कबूल कर लिया है कि मोदी-शाह के कहने पर गलतियां हुई हैं।

यह कुबूलनामा यदि सामने आता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में वोट चोरी के लिए दोनों को चुनाव आयुक्त पर दबाव डालने की सज़ा भुगतने की तैयारी कर लेनी चाहिए। इसी कड़ी में ईडी, सीबीआई जैसी स्वतंत्र इकाइयों के अधिकारी और झूठ परोसते मीडिया पर भी भविष्य में गाज गिर सकती है। किसी ने सच ही कहा है कि बुरी संगत का असर सबको भुगतना होता है।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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